कोड़ा की कहानी अब फिल्मी गलियारे को छूती हुई ब्रह्मांड की ओर अग्रसर है। झारखंड त्रिशंकु विधानसभा का दंश झेलते हुए घोटालों का इतिहास रच रहा है। यहां के निर्दलीय मंत्री लगातार भ्रष्टाचार के आरोप में घिरते जा रहे हैं। कोड़ा को बेचारगी के भाव या कहें मजबूरी में सीएम बनाया गया। एक पार्टी विशेष ने इसे खुला समर्थन भी दिया। उसके नेता लगातार भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए चिल्लाते रहे, लेकिन कोड़ा सरकार चलती रही। झारखंड की सड़कों पर चलिएगा, तो कुहकते हुए आपकी गर्दन टेढ़ी हो जाएगी। उसमें कोड़ा बार-बार याद आएंगे। कोड़ा के चार हजार करोड़ रुपये की कहानी अब आंखों पर बल नहीं डालती और न माथे पर शिकन। यहां इस स्थिति के लिए जनता भी दोषी है। जनता लगातार त्रिशंकु विधानसभा का निर्माण करती है और निर्दलीय मंत्री बनकर लाभ उठाते हैं। राज्य की समस्याओं को लेकर कहीं से कोई आवाज उठती नहीं दिखती। यहां पर समाज को विभाजित करनेवाले मुद्दों को लेकर कोहराम मचते देखा है। सड़कों पर उन्माद देखा है, लेकिन विकास के लिए आवाज उठानेवालों की फौज नहीं दिखती। इस राज्य का भविष्य कैसा होगा? ये सवाल कोई नहीं पूछता। इस राज्य पर तो भाजपा और कांग्रेस, दोनों ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर शासन किया, वैसे में भी वे फिर से सुशासन लाने की बातें कर रहे हैं। प्रश्न ये है कि इन पर भरोसा कैसे किया जाए। घोटालों के बीच राजनीतिक उदासीनता की ये कहानी जनता सुन-सुनकर ऊब चुकी है। कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा। घोटालों के आरोपी कहते हैं कि उन्हें फंसाया जा रहा है। अगर फंसाने का मामला सही है, तो फिर मामला क्या है? जो भी हो, राज्य की छवि मटियामेट हो गयी है।
मुझे कुछ दिन पहले रिंग टोन रखने का चस्का लगा था, तरह-तरह के रिंग टोन्स। अरे कहां जा रिया है, या भाई साहब आपका फोन आया है, जैसे रिंग टोन्स। खोपड़ी भी पूरी खाली हो गयी है ऐसा लगता है इन्हें सुनकर। अगर जिंदगी बेमजा हो गयी है, तो इन रिंग टोन्स का उपयोग करके देख सकते हैं। इनकी बदौलत आप कितने रिएक्शन पा जाएंगे। कोई गरियाएगा, कोई पुचकारेगा और कोई ब्लू टुथ के सहारे आपकी रिंग टोन्स को अपनाएगा। तकनीकी की दुनिया ने व्यक्तित्व की परिभाषा बदल दी है। रिंग टोन्स बताते हैं कि फलाना आदमी लफ्फुआ या बाजारू किस्म का है या कुछ सीरियस। फिल्मी गीतोंवाले रिंग टोन्स की बात ही निराली होती है। कोई धुन आपको कभी शांत माहौल में उस जन्नत की सैर कराएगा, जहां से आप कभी लौटना नहीं चाहेंगे। कुछ कानफोड़ू किस्म को टोन्स दिमाग को भन्ना डालते हैं। बाजार में रिंग टोन्स भी स्टेटस सिंबल बन गए हैं। वे बताते हैं कि आपका मोबाइल किस टाइप या ब्रांड का है। स्टीरियो साउंड के सहारे आपकी मोबाइल की गुणवत्ता आंकी जाती है। जब मोबाइल लटक वस्तु बन ही गए हैं, तो रिंग टोन्स का भी जिंदगी से जुड़ाव उतना ही सच हो गया है। इसे दरकिनार कैसे किया जाए। हमने तो अपने फिल्मी गीतोंवाले रिंग टोन्स बदल डाले। क्योंकि इन रिंग टोन्स ने अब चिड़चिड़ापन भी लाना शुरू कर दिया है। बाथरूम में रहिएगा, तो बज उठेगा गली में आज चांद निकला। भैया चांद तो बाद में निकलेगा, लेकिन अपनी तो इंप्रेशन खाली-पीली मिट्टी में मिल गयी। हम तो साइलेंट मोड में मोबाइल को रखने के पक्षधर हो गए हैं। न तो किसी को परेशानी होगी और न कोई टोकेगा। लेकिन अगर सब साइलेंट मोड में मोबाइल यूज करने लगें, तो रिंग टोन्स के बाजार का क्या होगा? ये भी रिसर्च का विषय है। वैसे रिंग टोन्स है रोचक विषय वस्तु।
सचिन तेंदुलकर को किसी पहचान की जरूरत नहीं है। क्रिकेट के बाइबिल तेंदुलकर ३२ पार की इस उम्र में भी महाशतकीय पारी खेलकर सबको हैरत में डाल देते हैं। सचिन की पारी से पहले महीनों तक अखबारों में हेडिंग लगती रही या एक्सपर्ट्स कहते रहे कि उम्र हावी होती जा रही है तेंदुलकर पर। प्रशंसक नाराज होते। लेकिन हम लोगों से ज्यादातर लोग इस बात पर सहमत होते कि तेंदुलकर अब उम्र के खास पायदान पर आ गए हैं। वैसे में मुझे जवानी और बुढ़ापे के बीच फंसे किसी व्यक्ति को लेकर इतनी बहस आज तक नहीं देखने को मिली। तेंदुलकर इस बात के गवाह हैं कि अपने कार्य के प्रति दीवानगी उसे किस कदर सर्वश्रेष्ठ बनाए रखती है। हम तेंदुलकर द्वारा महान स्पिनर अब्दुल कादिर की गेंदों के परखच्चे उड़ाने की घटना को भी शायद ही भूले हों। ऐसे व्यक्ति बिरले ही होती हैं। लेकिन इनसे सीखे लेनेवाले भी कम ही। तेंदुलकर कर्म की श्रेष्ठता को लगातार सिद्ध करनेवाले रहे हैं। हमारे जैसे लोग न जाने कितनी बार हजारों लेख उन पर लिख चुके होंगे, लेकिन तेंदुलकर को शायद ही इससे कोई फर्क पड़ता है कि कोई उनके बारे में क्या कह रहा है। विवादों से दूर रहनेवाले तेंदुलकर आनेवाली पीढ़ी के खिलाड़ियों के लिए मिसाल रहेंगे। आज के क्रिकेट में पैसा बहुत है, लेकिन इस खेल के प्रति कमिटमेंट जैसे विचार तेंदुलकर ही पढ़ा सकते हैं। हम ज्यादा क्रिकेट के बारे में ज्यादा विस्तार से नहीं जानते, लेकिन इतना जानते हैं कि तेंदुलकर के करियर को फॉलो करते रहना आधी क्रिकेट को जानने जैसा है।
छत्तीसगढ़ उपचनाव परिणाम से टूटा रमण सिंह का गुरूर
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छत्तीसगढ़ की एक विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के परिणाम से चाउर वाले बाबा उर्फ
रमन सिंह को झटका लगा है. वैशाली नगर विधानसभा उपचुनाव परिणाम से रमण सिंह की
प्र...
Mohalla Live
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Mohalla Live
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“कृपया प्रभाष जोशी का झूठा महिमामंडन न करें”
Posted: 10 Nov 2009 10:17 PM PST
अपने अपने पुरुष! [imag...
मोहल्ले में हल्ला [आश्रय-21]
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[image: Dharavi_Slum_in_Mumbai] *पिछली कड़ियां-**कारवां में वैन और सराय की
तलाश[आश्रय-20]** **सराए-फ़ानी का मुकाम [आश्रय-19]** **जड़ता है मन्दिर में
[आश्...
काले अक्षर अब भैंस बराबर कैसे!!!
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भैंस-भैंस में अब पढ़ना सीखिए. इस बात में बेहेस (बहस) करने की क्या जरूरत आन
पड़ गई.. आप ही पढ़ लो ..भैंस-भैंस में ये पढाई .. बड़े काम की है.. और जनहीत में
जा...
क्या इस वृद्धा के लिए कभी गुड टाइम्स आएगा??
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इस वृद्धा के लिए देखिये, जो अपने रैन बसेरे कीतरफ बढ़ रही है। पीठ पर लदी थैली
फिर लिखाहै गुड टाइम्स। लेकिन क्या इस महिला के लिएकभी गुड टाइम्स आ पायेगा???
"फकत खामख्याली का कन्साइनमेंट "
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औसत आदमी के लिए यह सोच लेने से बड़ा ढाढस ओर कुछ नहीं है के सचाई की हमेशा जीत होती है -कर्टसी नैतिक शिक्षा ....यारो ने कहा है के लोभ भी एक कंटाजीयस बी...
चिट्ठाचर्चा और मैं..
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कल रात वापस लौट आये दो दिवसीय मॉन्ट्रियल यात्रा से. कोई विशेष उल्लेखनीय कुछ
भी नहीं. चाहें तो कहानी बनायें मगर अभी उद्देश्य कुछ और ही है.
शुक्रवार को मॉ...
समसाद मियां - अथ सीक्वलोख्यान
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हीरालाल नामक चरित्र, जो गंगा के किनारे स्ट्रेटेजिक लोकेशन बना नारियल पकड़ रहे
थे, को पढ़ कर श्री सतीश पंचम ने अपने गांव के समसाद मियां का आख्यान ई-मेला है। ...
डरपोक एक 'लघुकथा'
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'लघुकथा'
*डरपोक*
- *दिनेशराय द्विवेदी*
*लड़का और लड़की दोनों बहुत दिनों से आपस में मिल रहे थे। कभी पार्क में, कभी
रेस्टोरेंट में, कभी चिड़ियाघर में,...
हम क्वालिटी बेचते हैं
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एक अर्से से दरियागंज जा रहा हूं। प्रिंस पान की दुकान देखता रहा हूं। लेकिन
पंद्रह साल बाद आज सड़क पार कर गया। तस्वीरें ली और प्रिंस पान वाले से बात...
हमें बुलाती है दुनिया हमीं नहीं जाते
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आज मुन्नवर राना को पढ़ने का बहुत मन किया तो नेट को खंगाला। कविता कोष पर वह
मिले। उन्हें पढ़ते वक्त पाठक एक अंश में खुद को भी पढ़ता है, ऐसा मेरा मानना
है। ब...
पापा की बहुत याद आ रही थी...
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कल सुबह पापा की बहुत याद आ रही थी.. और मुझे पता है पापा कहाँ दिखते है और बात
करते है.. कंप्यूटर तो ऑन ही था...बस हेडफोन के दोनों सिरे (माइ़क और स्पीकर)
सह...
When Dyscalculia Strikes
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I stood at the ATM machine and fumbled. I had forgotten the numbers. There was a dude talking away on his cell phone next to the other ATM machine. I fed in ...
क्या इन्हें पितृत्व या मातृत्व का अधिकार होना चाहिए?
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कोई भी समाचारपत्र उठाओ तो बच्चों के साथ होते अत्याचार भी पढ़ने को मिल जाते हैं। क्या बच्चों के साथ अत्याचार संसार का सबसे जघन्य अपराध नहीं है? क्या ऐसा अत्याच...
2 नवबंर 09: टेलीविजन के इतिहास में एक अश्लील दिन
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मूलतः प्रकाशित- मोहल्लाlive
हमें स्क्रीन पर तीन-चार बुज़ुर्ग टकले, सिर्फ सिर दिखाई देते हैं। एक के ऊपर
एक आपाधापी करते हुए मीडियाकर्मी आगे बढ़ते हैं। बादश...
प्रचार बिन सब सून
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अपनी नयी फिल्म ‘जेल’ के प्रमोशन के लिए मैं फैशन वीक में रैंप पर उतरा तो कई
लोगों ने मुझसे एक सवाल किया कि क्या रैंप पर उतरना फिल्म कलाकारों के लिए अब
फैशन ...
मतदाता पहचान पत्र यानी पहचान कौन
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झारखंड में मतदाता पहचान पत्रों में त्रुटियों की शिकायत आम बात है। इसी कड़ी
में मुकेश जी की पीड़ा एक साथ कई सवाल खड़े करती है। क्या इस काम में लगे लोगों
को ...
ham aur tum aur ye samaaN
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So, what are the chances that the beginning of a song sung by the same
singer and picturised on the same actor would be the same?
In 1959 Usha Khanna debut...
पानी तेरे कितने रूप!
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पानी! जीवनदायक लेकिन् कभी-कभी जीवन हरक, इस पानी ने इस साल कितने रूप दिखाये,
न जाने कितने लोगों को घर से बेघर कर दिया, नजाने कितनों को लील गया तो कहीं
दूसरी...
बदल रहे हैं बच्चे
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एक दिन एक परिचित के घर गया था। पांच साल का उनका हाइपर एक्टिव बच्चा एक प्ले
स्कूल में पढ़ता है। ये लोग मुजफ्फरपुर के हैं। बच्चा तीन साल मुजफ्फरपुर में
रहने ...
बस गाँधी-नेहरु महान.., और बाक़ी सबके बलिदान....??
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अभी डेढ़ महीने पहले ही हमने अपना 62वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाया... उसका दर्द
सीने से गया भी नहीं था कि लो गाँधी जयंती आ गयी....!!
आप कहेंगे स्वतंत्रता दिवस का...
जाल के उस पार.......
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आज की मनहूस सुबह ने मुझे जिस पीड़ा और ग्लानि से भर दिया कि शायद ईश्वर
भी मुझे माफ न करे। मेरे फ्लैट की खिड़की के साथ करीब आठ फुट लंबा और दो फिट
चौ...
मेरे आस-पास बहती है एक सुलगती नदी
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लेखक परिचय
अश्विनी कुमार पंकज 1964 में जन्म/डॉ. एम. एस.‘अवधेश’ और स्व. कमला देवी के सात
संतानों में से एक/1991 से जिंदगी और सृजन के मोर्चे पर वंदना टेटे की ...
जरूरी है छद्म-सेक्युलरवादियों से बच कर रहना
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चुनाव का मौसम आता है और हमारे वामपंथी बुध्दिजीवी, कांग्रेसी पाखण्डी और पंच
सितारा होटलों में रहने वाले लोग तथाकथित समाजसेवी सेक्युलरिज्म पर अपना ज्ञान
बघ...
सियासी डगर पर नौकरशाहों के कदम
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नौकरशाही का सफ़र तय करते हुए राजनीति की डगर पर बढ़ने वालों की फ़ेहरिस्त में
डॉक्टर भागीरथ प्रसाद का नाम भी जुड़ गया है । इंदौर के देवी अहिल्याबाई
विश्वविद्यालय...
बराक ओबामा और ईराक़ की अधूरी दास्तान
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जो तस्वीर आप यहाँ देख रहे हैं, वह छः साल पहले के ईराक़ की कड़वी हक़ीक़त को बयान
करती है। बदनसीबी से आज भी हालात वैसे ही हैं। यह तस्वीर मैंने अप्रैल 2003 में
ईर...
मैं खुद अपनी ही तलाश में जुटा हूं। उन हजारों ब्लागरों की जमात में रहकर विचारों के प्रवाह को सही दिशा देना चाहता हूं, जो जाने-अनजाने ब्लाग की दुनिया में आने की गलती कर चुके हैं। बस अब खुद को बदलने का प्रयास है। अब मैं खुद को उन आम ब्लागरों का हिस्सा मानता हूं, जिन्होंने हिन्दी में बात करने, लिखने और इसे आत्मसात करने की चेष्टा की है। आप दक्षिण भारतीय हैं या उत्तर भारत, इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। आप मेरे साथ दोस्त और सहभागी बनकर हिन्दी को आम आदमी की भाषा बनाने में सहयोग करें। खुद को तलाशने का अभियान जारी है।
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