एक सज्जन से बात हो रही थी ब्लागिंग पर, तो उन्होंने कहा कि ब्लागिंग अच्छी चीज है, लेकिन नशा भी है और बीमारी भी। हम आंख में आंख मिला नहीं पाये, कनखिया के उनकी बातों का मतलब निकालते रहे। फिर सोचा कि ये नशा भी कैसा नशा है। बिना टिपियाए मन है कि मानता ही नहीं है। दसों उंगली दर्द करने लगता है। मन कहने लगता है कि क्या ये उंगलियां सिर्फ खाना खाने के लिए बनी हैं। इससे टिपिया के हम आभासी दुनिया को कुछ तो दे सकते हैं। मन सेंटीमेंटल हो जाता है, साथ ही स्प्रीचुअल भी। हमारे जैसे भोले भाले लोग इस ब्लागिंग के चक्कर में आकर अपना टाइम बर्बाद कर दे रहे हैं। ज्यादातर सुझाव और सलाह देनेवाले ब्लागियाने को आमदनी से जोड़ते हैं। हम कहते हैं कि भैया नशे में कैसी आमदनी। आप भांग खाकर नशा करते हो, हम दो घंटे टिपिया के। जी हल्का हो जाता है। ऐसा लगता है कि परम पिता से बातचीत हुई है। हम जानते हैं कि आदमी खाली हाथ आता और जाता है। इसलिए जितना चाहते हैं, उड़ेल देते हैं। जिससे हमारे जाने के बाद भी लोग इससे अपनी ग्यान पिपासा शांत करते रहें। सुनते हैं कि नशा में भी क्वालिटी होता है, कैसा नशा होना चाहिए सोचना पड़ता है। लेकिन इस ब्लागिया नशा में कोई क्वालिटी नजर नहीं आता है। जितना उड़ेल सको, उड़ेलोवाला सिस्टम है। सब तबाह है। कोई कहता है कि हम तो जोगी हो गए हैं, रमता जोगी बहता पानी। हम कर्म में विश्वास करते हैं। अगर इतना ही कर्म करते हो, तो टिप्प्णी के लिए इंतजार क्यों करते रहते हो। चुपचाप लिखकर रास्ता नापो। लेकिन कोनो दद्दा का एक कमेंट्स पाने के लिए जी ललचाया रहता है। वैसे ब्लागियाने के चक्कर में हमारा टाइपिंग स्पी़ड बढ़ गया है। कल शोलेवाला गब्बर मिला था सपने में। बार-बार चिल्ला रहा था, ये उंगलिया दे दे ठाकुर। बहुत ब्लागियाता है इन्हीं उंगलियों से। हमारा सपना बीच में टूट गया। ये सपना भी इसी नशे के कारण आया होगा। हम तो छटपटा रहे हैं कि इस कौन सी नयी बीमारी से पाला पड़ गया है।
ब्लागियाते , ब्लागियाते निकल गयी है जान
अब न रहा कोई ऐसा अरमान
जिससे बढ़ेगा मान
ईश्वर दर्शन की चाह में
ब्लागिया रहे लगातार
कर रहे अपन पे अत्याचार
Saturday, November 14, 2009
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1 टिप्पणियाँ:
इसे नशा कहे या बीमारी जितना करते है उतना ही बढ़ता जाता है ..एक बार ब्लॉगिंग में डूबे ना तो पार पाना मुश्किल ही रहता है..उंगलियाँ और आँखें दोनो तक जाए पर मन कहता है नही लिखते रहो..बढ़िया प्रसंग..
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