Thursday, July 21, 2011

अब वो छटपटाते नहीं, बस आह भरकर रह जाते हैं,

जब पूनम पांडेय ने क्रिकेट के वर्ल्ड कप के दौरान खुद के इंडिया के फाइनल जीतने पर न्यूड होने की बात कही थी, तो पूरा इंडिया उन्हें जान गया था, पहचान गया था. हमारे यहां किसी तरह की निगेटिविटी को उसी तरह से स्वीकार किया जाता है, जैसे कि कोई रसगुल्ले को उसकी मिठास के  साथ स्वीकार करता है. आप कितने भी बड़े विद्वान हैं, लेकिन अगर आदर्श की बात करेंगे, तो उसे अनुसना कर दिया जाएगा, लेकिन अगर थोड़ा गरियाने या नौटंकी वाली बात करें, तो सारे लोग स्वीकार करेंगे. हमारे समाज में ये नंगई वाली मानसिकता हमारे मन और दिमाग में इस कदर घूस चुकी है कि लोग उसे ही ज्यादातर समय प्राथमिकता देते हैं. नंगई मानसिकता में हर उस चीज को लेकर एक खास तरह का पूर्वाग्रह रहता है, जो होता है तो खास है, लेकिन उसका पूरा औरा गालियों को ओढ़े रहता है.
मेरे लिये फेसबुक का संसार कुछ खास था. कई दोस्त बने और काफी लोगों से बेहतर ताल्लुक भी रहता है. लेकिन कमेंट्स के घटते स्तर ने एक दिन मन को इतना उलझा दिया था कि कमेंट कर दिया कि मुझे चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए. सब जानते हैं कि चुल्लू भर पानी में डूबा नहीं जा सकता है. इसलिए समंदर में डूबने की बात कर डाली. लोगों ने खूब कमेंट्स भी किए. मेरे लिये सबसे बड़ा फैक्टर ये रहा कि खुद को गरियाने के चक्कर में मैंने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया. लोगों ने भी अपनत्व दिखाते हुए एक से एक कमेंट्स जड़े.
डेल्ही बेली फिल्म देखिये. गाली को डीके बोस बना डाला और प्याली में तूफान इस कदर मची कि फिल्म हिट हो गया. अब एक पिक्चर और आ रही है, जो कि गालियों पर ही बेस्ड है. यानी कि गालियों को भजाने की इस कदर रेस मची है कि सारी चीजें दरकिनार कर दी जा रही ह
बोल्ड होना मांगता है, तो गालियों का इस्तेमाल करिए. ये गाली, नंगई हमारी मानसिकता में जहर है या गंगा, ये तो आनेवाले समय में ही पता चलेगा, लेकिन अब हममें शायद प्रतिरोध की क्षमता भी जाती रहेगी. क्योंकि हम लोग गाली को अंतिम हथियार की तरह इस्तेमाल करते थे. लेकिन जब यही आम बोलचाल की भाषा हो जाएगी, तो हम क्या करेंगे. गालियों का जुबान पर आना एक फैशन की तरह है. आज के दौर में इसका नहीं होना उसी तरह से पिछड़ेपन की निशानी है, जैसे कि किसी के लिए गर्ल या ब्वाय फ्रेंड का नहीं होना है.गाली बोलो, बोल्ड बनो. ओ शिट बोलो...छा जाओ. क्योंकि ये टाइम की डिमांड. वैसे भी अंगरेजी गाली की अपनी महिमा होती फअपने हम हिंदी मीडियम में पढ़ने के कारण इस ग्रंथी से बेचैन रहे कि हमें अंग्रेजी गाली नहीं आती. समय के साथ गालियों के अर्थ भी समझने लगा. आज के दौर में अंग्रेजी गालियों को लेकर जितना ग्लैमर होना चाहिए, वो अब नहीं रहा, क्योंकि अब गालियों को हिंदी फिल्मों का सपोर्ट मिलने लगा है. वैसे भी मानता हूं कि जो शख्स गालियों का भाषा में बुरी तरह इस्तेमाल करता है, लोग उसे ज्यादा इज्जत देते हुए उसकी हां में हां मिलाते हैं. आपको अपने आसपास हमेशा कुछ लोग मिल जाएंगे, जो बात-बात पर यौनिकता का लेसन देते रहते हैं, कभी-कभी तो कान में तेल डालने के बाद मन के दरवाजे से उनकी छवि बार-बार प्रहार करती है. वैसे भी जब से हिंदी सिनेमा ने पारो के प्रेम को देव डी के बहाने बेचा है. उसने लोगों को फिल्मों के देखने के अंदाज को बदल दिया. अब लोग फिल्म आदर्श के लिए नहीं देखते. उन्हें तो फुल टाइम ओरिजनल अपनी लाइफ से जुड़ा इंटरटेनमेंट चाहिए, वैसे भी लोगों में कम से कम गालियों की रियलिटी को स्वीकारने का साहस तो हुआ. अब उन्हें ये भी स्वीकार करना होगा कि हमाम में सब नंगे हैं. हमारे अंदर जो राक्षस है, वो अब खुल कर बाहर आने लगा है. न्यूज चैनलों में भी सेक्स रैकेट के खुलासे की खबर को उसी चटखारे के साथ पेश किया जाता है जैसे मर्डर टू पिक्चर की स्टोरी है. फर्क सिर्फ ये रहता है कि इसे अपराध बताते हुए एंकर मसाले लगाता रहता है, वहीं मर्डर टू पिक्चर की नंगई परोसते समय उसे उसमें डायरेक्टर की कला और एक्ट्रेस की बा़ड़ी-फिगर नजर आती है. हमारे आसपास का समाज अब आपको बेचैन नहीं करेगा,
एक बात पर आपने गौर नहीं किया कि अब आपको दीवारों पर पहले की तरह नंगी अंग्रेजी फिल्मों के पोस्टर नहीं दिखते. ऐसा इसलिए कि इंटरनेट और टेक्निकल क्रांति ने इस जन-जन तक पहुंचा दिया है. अब तो बच्चे भी आपको आपसे ज्यादा किसी भी सीन की कहानी बता देंगे. अपने अंदर इसे पढ़नेवाले झांकेंगे क्या, नहीं, क्योंकि उन्हें तो ये गाली वाला लोचा पहले ही इस कदर गुदगुदा गया है, अब वो छटपटाते नहीं, बस आह भरकर रह जाते हैं, इस आह को बेचैनी में बदलिये जनाब, यही समय की मांग है

2 टिप्पणियाँ:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

thode dinon baad ek susanskrit bhasha me bolna gaali jaisa hi ho jaayega...

प्रवीण पाण्डेय said...

नंगियत, दबंगियत और बदनियत ही शेष रह गया है।

यहां आइये,तो टिपियाइये, सिर्फ नकारात्मक शब्दों से बचें और सब मंजूर है। बहस को आगे बढ़ाये। सकारात्मक संवाद को बढ़ाने की दिशा में आपका सहयोग चाहिए। आप देंगे न!!

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