Tuesday, October 4, 2011

मां तुमि जागो.

नवरात्र में जब भी मां का ध्यान करता हूं, मन बेचैन हो जाता है. देश और समाज में लगातार हो रहे बदलाव, बढ़ती महंगाई और नाउम्मीदी के बढ़ते बोझ के बीच मन उम्मीद की एक किरण ढूढ़ता है. इन्हीं सबके बीच ठीक छह बजे शाम में रांची के खेलगांव जानेवाले मोड़ के पास हादसे की खबर आती है. मन में उत्साह की फूटी चिंगारी पर पानी के छींटे पड़ जाते हैं. आखिर क्यों मां ने एक जिंदगी छीन ली, वो भी अष्टमी के दिन. मां की आराधना तो हर कोई कर रहा है. मरनेवाले के घरवाले भी कर रहे होंगे. सलामती की दुआ मांग रहे होंगे, लेकिन एक झटके में सारा कुछ बदल गया. मेरा मन संघर्ष करते हुए लहूलुहान हो जा रहा है. डेस्क पर काम करते हुए बेहतर हेडिंग सोचने के लिए पाजिटिव थिंकिंग का तर्क दिमाग में दौड़ाता हूं. जोशीले शब्दों को जेहन में दौड़ाना पड़ता है. लेकिन ये जोश तर्क और आंकड़ों के खेल में कम हो जाते हैं. खबर है कि गांव खत्म हो रहे हैं. अब शहरी आबादी बढ़ती जा रही है. शहर में एक कमरा खोजना भी पहाड़ होता जा रहा है. चावल, चीनी, दूध, पेट्रोल सारा कुछ महंगा होता जा रहा है. आफिस से घर आते वक्त सड़क पर उमड़े भक्तों के सैलाब को देखकर सिर्फ एक चीज महसूस होता है कि ये चार दिन चांदनी की, फिर अंधेरी रात. मैं अपने मन में लगातार उन चैन दिलानेवाले अल्फाजों को दोहराता हूं, जो मुझे कुछ तो सुकून दे सकें. लेकिन सुकून नहीं मिलता, क्योंकि टीवी पर अन्ना का कांग्रेस को अल्टीमेटम नजर आता है. यानी भविष्य का चेहरा नजर आता है. अन्ना पर भरोसा नहीं होता. एक मन तोड़नेवाली खबर गुजरात से आती है. आईपीएस संजीव भट्ट अरेस्ट कर लिये गए हैं.  मैं नाउम्मीदी के बीच संजीव भट्ट के संघर्ष को उम्मीद के रूप में देखता हूं. देखता हूं कि कहीं से सिस्टम से लड़ने के लिए जिस आत्मबल की जरूरत है, वो भट्ट सरीके व्यक्ति के पास है.यही आत्मबल मुझे अपने देश के सही राह पर चलने की उम्मीद जगाता है. वैसे मां का ध्यान आते ही बस एक ही शब्द मन बोलता है-मां तुमि जागो.

3 comments:

Anonymous said...

ये आत्मबल पहले क्यों नहीं जगा संजीव जी के अन्दर. और सिर्फ एक ही मामले में जगा, मामले तो कई सारे थे और हैं, क्या ये आत्मबल उन मामलों में भी जगेगा संजीव जी का.

प्रवीण पाण्डेय said...

नमस्तुभ्यं..

अरूण साथी said...

"मां तुमि जागो."
आमीन

यहां आइये,तो टिपियाइये, सिर्फ नकारात्मक शब्दों से बचें और सब मंजूर है। बहस को आगे बढ़ाये। सकारात्मक संवाद को बढ़ाने की दिशा में आपका सहयोग चाहिए। आप देंगे न!!

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
There was an error in this gadget
There was an error in this gadget

अमर उजाला में लेख..

अमर उजाला में लेख..

हमारे ब्लाग का जिक्र रविश जी की ब्लाग वार्ता में

क्या बात है हुजूर!

Blog Archive