Monday, April 2, 2012

फेसबुक... फेसबुक.... फेसबुक.....

अच्छा अगर आपसे कहूं कि आप फेसबुक पर हमारे दोस्त हैं... वो भी दो हजार समथिंग दोस्तों में.... तो क्या आप अचकचाएंगे तो नहीं. हो सकता है कि आप मेरे फ्रेड्स लिस्ट में हों. लेकिन अनजान हों. कुछ वैसे ही जैसे लोग कमरे में कहीं किसी जगह रुपए रखकर भूल जाते हैं. और वक्त-बेवक्त कभी उन्हें वो रुपए हाथ लग जाते हैं, तो उनकी खुशी की सीमा नहीं रहती.

बहुत से लोग फेसबुक को गरियाते हैं, तो कई लोग इसे एक नशा, एक किस्सा या रस्मअदायगी का माध्यम बताते हैं. मेरे लिए फेसबुक क्या है, मैं भी नहीं जानता. हां, इसे न तो गाली दे सकता हूं और न ही इसे छोड़ सकता हूं. ये जानते हुए भी कि मेरे किसी स्टेटस पर बस दो या तीन कमेंट्स ही आते हैं. खुद की बेचारगी पर हंसते हुए दूसरों के कमेंट्स जरूर पढ़ता जाता हूं. हमेशा आब्जर्वर बनकर उन हजारों स्टेटस से गुजरते रहना, किसी किताब के पन्ने पलटने से कम नहीं लगता.

जिंदगी के हजारों पन्नों को तस्वीरों के मार्फत बयां करने की कोशिश को फेसबुक जिंदा रखे हुए है. फेसबुक तमाम अवरोधों, विरोधाभासों के बाद भी आपको ये तो एहसास करा ही जाता है कि आप कुछ नहीं...इस दुनिया में आप एक किरदार की तरह हैं. कभी-कभी गुजर चुके लोगों के स्टेटस पर जाकर गौर फरमाइएगा, तो लगेगा कि वो आपसे बात कर रहे हैं.

बतियाना शगल है, लेकिन टिपियाना, लगातार स्टेटस अपडेट रखना या करते रहना मजाक की बात नहीं. उन तमाम बंदों को शुक्रिया कहना चाहता हूं, जो तमाम लिंकों को यूं वजह या बेवजह, सनकपन में अपने स्टेटस पर डालते रहते हैं. हम भी अलसायी आंखों से क्रशर को बस ऊपर नीचे कर हर छोटी-बड़ी सूचनाओं से अवगत होते रहते हैं. फेसबुक बनते-बिगड़ते रिश्तों का गवाह भी है.

मेरे एक फेसबुक फ्रेंड अंशुमाल रस्तोगी जी का आज जन्मदिन है. मैंने फेसबुक खोलकर अपडेट देखते ही उन्हें तत्काल बधाई दी. कहां बरेली... कहां रांची. लेकिन दिलों के तार देखिए फेसबुक के माध्यम से जुड़ गए. दिल्ली के कई बंदे, कानपुर के कई हीरो और पटना के कई दिग्गज अपनी सूची में हैं. इतना तय है कि हम उन्हें जानते हैं. क्योंकि हम रोज उनकी शख्सियत से अपडेट होते रहते हैं. फेसबुक...ओस की बूंद की तरह हमेशा ताजा ही लगता है. दोपहर में ओपेन करो या शाम में... पुरानी बातें गुजरते वक्त के साथ आगे बढ़ जाती हैं. रह जाती है, तो सिर्फ फ्रेश अपडेट. वैसे मैं स्टेटस अपडेट करने में पीछे ही रह जाता हूं. फेसबुकिया बुखार देखते हैं कि कितने दिनों तक कायम रहता है.

2 comments:

संगीता पुरी said...

जबतक व्‍यस्‍तता हद से न बढ जाए .. फेसबुक का बुखार उतरने वाला नहीं !!

प्रवीण पाण्डेय said...

आपको फेसबुकीय शुभकामनायें..

यहां आइये,तो टिपियाइये, सिर्फ नकारात्मक शब्दों से बचें और सब मंजूर है। बहस को आगे बढ़ाये। सकारात्मक संवाद को बढ़ाने की दिशा में आपका सहयोग चाहिए। आप देंगे न!!

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